कोलाज सा....

Tuesday, February 9, 2010

....कोशिश करता हूँ

स्ट्रगल ('संघर्ष' शब्द में वैसे अर्थ-बिम्ब नहीं है। दर्द और तनाव, टूटन और नाउम्मीदी के छीलते काँटों की सटीक व्याख्या 'स्ट्रगल' शब्द से ही होती है: 'मुझे चाँद चाहिए-सुरेन्द्र वर्मा', ३७०-३७१) की गहनतम अनुभूतियों से उपजी चंद पंक्तियां.....

सिगरेट के धुंए से दिल को काला करने की नाकाम कोशिश करता हूँ
हर मरती हुई सांस में इक जिंदगी तलाशने की कोशिश करता हूँ.....

सोचता हूँ क्या मिला अच्छा इंसान बनकर।
हर पल इक बुरा इंसान बनने की कोशिश करता हूँ॥

हो ना जाऊं कहीं मैं बेख़ौफ़ इतना की खुदा भी डरने लगे।
रोज--रोज यूँ ही खुद को डराने की कोशिश करता हूँ॥

बरास्ते आँखों के खून का सैलाब उमड़ आया है।
रगों में बहते लहू को पानी बनाने की कोशिश करता हूँ॥

अपनों के दिए जख्म में दर्द उभर आता है।
जब किसी गैर को मरहम लगाने की कोशिश करता हूँ॥

उठ ना जाये भरोसा कहीं खुदा की खुदाई से।
हर इबादतगाह में सजदा करने की कोशिश करता हूँ॥

गम जुदाई का नहीं उनकी बेवफाई का भी नहीं।
वो उतना ही याद आये जितना भुलाने की कोशिश करता हूँ॥

......कोशिश करता हूँ

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दूसरों की जिंदगी में ख़ुद के मायने तलाशता हूँ.