कोलाज सा....

Sunday, April 19, 2009

ग्रिगोरी पेरेलमन और गणित का दुर्भाग्य: हम कहाँ हैं?

शुरुआत करते हैं शीर्षक के अन्तिम हिस्से से. हमारे देश में अभी जो जुमला बहुत आम है खासकर ऐसे संस्थानों में जहाँ शोध होता हो कि आजकल अच्छे बच्चे शोध में आते कहाँ है। लेकिन हम कहें जी जो भूले भी जाते हैं उनकी प्रतिभा का गला घोंटने में यहाँ कोई संकोच नहीं होता है। फिलहाल विभाग में जो अभी चर्चा का विषय है कि दो रिसर्च स्कॉलर्स को कॉम्प्रेहेंसिव (एक परीक्षा जो लिखित और मौखिक दोनों तरह से ली जाती है और उसमें क्लेअर होने के बाद आपको शोध जारी रखने कि अनुमति दी जाती है) में अनुत्तीर्ण कर दिया गया है। पूरे मामले का सबसे दुखद पहलू ये है कि उसमें से एक यहीं पर अपने विभाग का टापर रह चुका है। जाहिर है परदे के पीछे की कहानी कुछ और ही है.........

आते
हैं शीर्षक के पहले हिस्से पर, ग्रिगोरी पेरेलमन लेनिनग्राद (आज का सेंट पीटर्सबर्ग, रूस) १३ जून १९६६ में पैदा हुए और २००२ में मशहूर हुए सदी पुरानी एक गणित में सबसे कठिन मानी जाने वाली समस्या को हल करके (Poincaré conjecture: 1904) जिसके लिए बाद में उन्हें फील्ड मैडल (२००६) से नवाजा गया जो विषय विशेष में नोबेल प्राइज के बराबर माना जाता है और मजे की बात पेरेलमन जी ने अवार्ड लेने से साफ़ माना कर दिया। और जो कारण सामने आया वो शोध समुदाय को आईना दिखा गया.....

(Perelman says in a The New Yorker article that he is disappointed with the ethical standards of the field of mathematics, the article implies that Perelman refers particularly to Yau's efforts to downplay his role in the proof and play up the work of Cao and Zhu).....

सम्प्रति पेरेलमन जी गणित में सक्रिय नहीं है और अपने माँ के साथ सेंट पीटर्सबर्ग में एक बेरोजगार का जीवन जी रहे हैं। महज ४२ साल की उमर और उनका इस तरह से गणित का छोड़ना....नुकसान तो गणित का ही हुआ .....फिलहाल प्रतिभाओं का कत्ले-आम जारी है कारण जो भी हो....

साभार-विकीपीडिया



जिंदगी को इस तरह से जी कि मौत से मिलना हुआ अभी-अभी,
दुआ-सलाम की और कहा कि मिलते रहा करो कभी-कभी.

13 comments:

  1. हुज़ूर आपका भी एहतिराम करता चलूं ............
    इधर से गुज़रा था, सोचा, सलाम करता चलूं ऽऽऽऽऽऽऽऽ

    Vaise Ganit se maiN bahut ghabraata huN chahe wo padhaayi wala ho chahe duniyadari wala.

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  2. क्या अजब विडंबना है!!

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  3. ओह! यही लोग आगे प्रतिभा-पलायन का भी रोना रोते हैं।

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  4. हालत वास्तव में बुरे है


    --वीनस केसरी

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  5. जब ऐसा होता है वाकई बहुत दुखद होता है। शेर पसंद आया।

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  6. वाकई मैंने भी कई अन्य से इस तरह के हालत सुने हैं

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  7. कंचन जी, मैं इतना दुखी हूँ इस समय की ये पोस्ट लिखने का मन नहीं था लेकिन न चाहते हुए भी लिखना पड़ा.
    संजय जी आप मेरे गरीबखाने पर आये, बहुत-बहुत शुक्रिया, दुनियादारी की गणित से हमको भी बहुत डर लगता है.
    समीर जी, मैथिली जी ने समस्या दूर कर दी है. आपका तहे-दिल से शुक्रगुजार हूँ.
    रविकांत जी, वंदना जी स्थिति वाकईबहुत ख़राब है.
    अभिषेक जी , सुशील जी और अनिलकांत जी आप आये और इस नवांकुर का उत्साहवर्धन किया, बहुत-बहुत धन्यवाद.

    और अंत में आप सबका फिर से बहुत-बहुत शुक्रिया और मैं आप सबकी उम्मीदों पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करूँगा.

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  8. प्रतिभा का क़त्ल जारी है आज भी...निसंदेह.."एक डॉ की मौत "फिल्म एक सचाई ही है

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  9. प्रतिभा का पलायन,प्रतिभा का दमन,और आज पढा-- प्रतिभा का कत्ल।
    बहुत ही दुखद।
    " कैसे सब कुछ एक दूसरे से जुडा हुआ है ना जुडकर भी----कहाँ-कहाँ, किससे, क्यूँ मै जुडता चल गया मै आज तक नहीं समझ पाया ।"
    सुखद संयोग--- आप भी चेन्नई मे रिसर्च कर रहे है और अर्पित जोशी(मेरी बहन का बेटा)भी और दोनो ने लगभग एक ही समय में ब्लोग की शुरुआत की---http://joshiarpit.blogspot.com

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दूसरों की जिंदगी में ख़ुद के मायने तलाशता हूँ.